वैदिक ज्योतिष में, सहस्र पूर्ण चन्द्रोदय (सहस्र चन्द्र दर्शन) किसी व्यक्ति के जीवन की 1000वीं पूर्णिमा को दर्शाता है, जिसे शथाभिषेकम के रूप में मनाया जाता है।
सहस्र पूर्ण चन्द्रोदय को सनातन परम्परा में सहस्र चन्द्र दर्शन या शथाभिषेकम कहा जाता है। "सहस्र" का अर्थ एक सहस्र (1000) है, "पूर्ण चन्द्र" अर्थात पूर्णिमा और "उदय" अर्थात चन्द्रमा का उदित होना।
एक चांद्र मास लगभग 29.53 दिन का होता है, अतः 1000 पूर्णिमाओं को देखने में लगभग 29,530 दिन लगते हैं, जो सौर वर्ष अनुसार लगभग 80 वर्ष, 8 से 10 मास की आयु में घटित होता है।
दृक् सिद्धान्त के अनुसार, जन्म के समय के उपरान्त जो पहली पूर्णिमा का चन्द्रोदय होता है, वह प्रथम चन्द्रोदय बनता है। तत्पश्चात ठीक 999 चांद्र चक्रों के बाद 1000वीं पूर्णिमा का चन्द्रोदय ज्ञात किया जाता है।
इस पावन अवसर पर दीर्घायु और आरोग्य हेतु शास्त्रों में विशेष पूजन का विधान है:
दीर्घायुष्य और आरोग्य की वृद्धि के लिए वैदिक मन्त्रों से हवन किया जाता है।
1000वें पूर्णिमा चन्द्रमा के दर्शन कर दूध, जल और अक्षत से अर्घ्य दिया जाता है।
सन्तानों द्वारा वृद्ध माता-पिता अथवा गुरुजनों का स्वर्ण पुष्पों से अभिषेक कर आशीर्वाद लिया जाता है।
ब्राह्मणों एवं जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और दक्षिणा देकर अक्षय पुण्य अर्जित किया जाता है।
यह सामान्यतः 80 वर्ष और 8 से 10 महीने की आयु में आता है।
क्योंकि यदि जन्म पूर्णिमा के दिन चन्द्रोदय से पूर्व हुआ हो, तो उसी दिन का चन्द्रोदय पहला गिना जाता है।
हाँ, वैदिक परम्परा में 1000 पूर्ण चन्द्र देखने के उपलक्ष्य में शथाभिषेकम का महापर्व मनाया जाता है।